Mystery - इंद्रदेव ने यहाँ छुपाये थे कर्ण के कवच और कुंडल!

एक ऐसी जगह जहाँ स्वयंम देवराज इंद्र ने छुपाये कर्ण के कवच और कुंडल।

इंद्रदेव ने यहाँ छुपाये थे कर्ण के कवच और कुंडल!

इस जगह के बारे में जानकर आप भी हैरान रह जाएंगे क्योंकि आज तक इस कलयुग में इस जगह के बारे में किसी को पता नहीं था और यहीं रखे हैं सूर्यपुत्र दानवीर कर्ण के कवच और कुंडल। 

वेदव्यास की महाभारत में इसका वर्णन मिलता है आदि पर्व के 112 अध्याय में एक कथा आती है, जिस में हमें कर्ण के कवच और कुंडलओ के साथ जन्म लेने के उसके निश्चित कारण को भी समझाया गया है।
दरअसल ये कवच और कुंडल अमृत से बने हुए थे। कहा जाता है कि ये इतने शक्तिशाली थे कि स्वयं भगवान कृष्ण के सुदर्शन चक्र और साथ ही भगवान शिव के त्रिशूल से भी नष्ट नहीं हो सकते थे।

कवच और कुंडल के होते हुए कोई भी अस्त्र या शस्त्र कर्ण को मार नहीं सकता था। महाभारत के युद्ध में कोई कर्ण का मुकाबला नहीं कर सकता था क्योंकि उसके पास कवच और कुंडल थे। 


लेकिन अब जानते हैं कि आखिर वर्तमान में वो कवच और कुंडल कहाँ पर स्थित है। हम ये सब जानते हैं कि युद्ध शुरू होने से पहले देवराज इंद्र ने एक ब्राह्मण का रूप धारण किया और कर्ण के सूर्य पूजा के दौरान उन्होंने दान मांगने गए और बदले में उन्हें कर्ण से उनके कवच और कुंडल मांग लिए। 

उसके बाद इंद्रदेव उस कवच और कुंडल को लेकर वहाँ से निकल गए। कहा जाता है ही हमारे पुराण में वर्णित है और यहाँ तक की महाभारत ग्रंथ में भी मौजूद हैं कि इंद्रदेव जानते थे की जब तक उनके पास यह कवच और कुंडल रहेंगे तब तक वो स्वर्ग में प्रवेश नहीं कर सकते थे

तो इंद्र देव ने उसे ओम पर्वत के तलहटी पर छुपा दिया, लेकिन उसके बाद चंद्रदेव ने उन्हें चुराने का प्रयास किया। जिसके बाद इंद्रदेव ने वापस उसे वह कवच और कुंडल लेकर सूर्यदेव की सहायता से उसे में ओड़िशा मैं स्थित कोर्णक सूर्य मंदिर के अंदर छुपा दिया।

कहते है सूर्य मंदिर की तलहटी यानी की उसके नीचे एक ऐसी गुफा है जिसमें कर्ण के कवच कुंडल आज भी मौजूद है और कहा ये भी जाता है कि आने वाले कलयुग के अंत में जब भगवान श्रीकृष्ण के दसवें अवतार यानी की कलकी अवतार इस कवच और कुंडल को धारण करेंगे।

धन्यवाद ||

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